50+ Best Mirza Ghalib Shayari in Hindi With Image – Ghalib Shayari

Mirza Ghalib Shayari – दोस्तों आज हम आपको मशहूर शायर मिर्जा गालिब की कुछ स्पेशल Ghalib Shayari पढ़ाने जा रहे अब जैसा की आपको पता होगा की मिर्जा गालिब अपने जमाने के मशुहर शायर हुआ करते थे जिनकी शयरी को सुनने के लिए तमाम लोग फ़ीड लगा लेते थे।

इसी के साथ बड़े – बड़े राज्य के राजा मिर्जा गालिब की मशुहर Ghalib Shayari को सुनने के लिए अपने दरवार मे बुलाते और उनकी मशहूर Mirza Ghalib Shayari को सुन करते थे तो आज के समय मे हम भी आपको यह सभी मशहूर शायरी इस पोस्ट के मध्यम से पढ़ाएंगे।

अब आपको तो पता होगा की मिर्जा जी की सभी Ghalib Shayari in Hindi बहुत प्रसिद्ध है तो आइए पढे इन सभी गालिब शायरी को और पढ़ने के साथ – साथ हम इसे अपने दोस्तों को भी शेयर करे और उनको भी यह मशहूर शायरी पढ़ाए।

 

Mirza Ghalib Shayari in Hindi

अब आपको हम यह मशुहर Mirza Ghalib Shayari in Hindi पढ़ाने जा रहे जो आपको बहुत अधिक पसंद आएगी साथ मे आप इन सभी Ghalib Shayari को अपने दोस्तों मे भी शेयर करे।

 

 

मेरे बारे में कोई राय मत बनाना ग़ालिब,

मेरा वक्त भी बदलेगा तेरी राय भी.,

 

तुम मुझे कभी दिल, कभी आँखों से पुकारो ग़ालिब,

ये होठो का तकलुफ्फ़ तो ज़माने के लिए है.,

 

इश्क का होना भी लाजमी है शायरी के लिये,
कलम लिखती तो दफ्तर का बाबू भी ग़ालिब होता.,

 

आगही दाम-ए-शुनीदन जिस क़दर चाहे बिछाए,

मुद्दआ अन्क़ा है अपने आलम-ए-तक़रीर का.,

 

कह सके कौन कि ये जल्वागरी किस की है,

पर्दा छोड़ा है वो उस ने कि उठाए न बने.,

 

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना,

दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना.,

 

इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया,

दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया.,

 

काँटों की ज़बाँ सूख गई प्यास से या रब,

इक आबला-पा वादी-ए-पुर-ख़ार में आवे.,

 

काव काव-ए-सख़्त-जानी हाए-तन्हाई न पूछ,

सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का.,

 

ghalib shayari

 

आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद,

मुझ से मिरे गुनह का हिसाब ऐ ख़ुदा न माँग.,

 

आज वाँ तेग़ ओ कफ़न बाँधे हुए जाता हूँ मैं,

उज़्र मेरे क़त्ल करने में वो अब लावेंगे क्या,

इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही,

मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही.,

 

अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा,

जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा.,

 

उस अंजुमन-ए-नाज़ की क्या बात है ‘ग़ालिब’,

हम भी गए वाँ और तिरी तक़दीर को रो आए.,

 

अगले वक़्तों के हैं ये लोग इन्हें कुछ न कहो,

जो मय ओ नग़्मा को अंदोह-रुबा कहते हैं.,

 

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा,

लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं.,

 

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक,

कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक.,

 

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना,

दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना.,

 

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले.,

 

Insaan Shayari

 

उम्र भर का तू ने पैमान-ए-वफ़ा बाँधा तो क्या,

उम्र को भी तो नहीं है पाएदारी हाए हाए.,

 

आज हम अपनी परेशानी-ए-ख़ातिर उन से.

कहने जाते तो हैं पर देखिए क्या कहते हैं.,

 

आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए,

साहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था.,

 

कहते हुए साक़ी से हया आती है वर्ना,

है यूँ कि मुझे दुर्द-ए-तह-ए-जाम बहुत है.,

 

एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब,

ख़ून-ए-जिगर वदीअत-ए-मिज़्गान-ए-यार था.,

 

ए’तिबार-ए-इश्क़ की ख़ाना-ख़राबी देखना,

ग़ैर ने की आह लेकिन वो ख़फ़ा मुझ पर हुआ.,

 

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक,

कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक.,

 

आशिक़ हूँ प माशूक़-फ़रेबी है मिरा काम,

मजनूँ को बुरा कहती है लैला मिरे आगे.,

 

अब जफ़ा से भी हैं महरूम हम अल्लाह अल्लाह,

इस क़दर दुश्मन-ए-अरबाब-ए-वफ़ा हो जाना.,

 

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है.
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है.,

 

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है.,

 

हुस्न ग़मज़े की कशाकश से छूटा मेरे बाद,
बारे आराम से हैं एहले-जफ़ा मेरे बाद.,

 

चंद तस्वीर-ऐ-बुताँ , चंद हसीनों के खतूत,
बाद मरने के मेरे घर से यह सामान निकला.,

 

ghalib shayari

 

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है.,

 

ज़िन्दगी से हम अपनी कुछ उधार नही लेते,
कफ़न भी लेते है तो अपनी ज़िन्दगी देकर.,

 

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले.,

 

चाँदनी रात के खामोश सितारों की कसम,
दिल में अब तेरे सिवा कोई भी आबाद नहीं.,

 

दर्द जब दिल में हो तो दवा कीजिए,
दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजिए.,

 

मरना चाहे तो मर नहीं सकते,
तुम भी जीना मुहाल करते हो.,

 

Khubsurat Shayari

 

बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ‘ग़ालिब’,
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं.,

 

कितना खौफ होता है शाम के अंधेरों में,
पूछ उन परिंदों से जिनके घर नहीं होते.,

 

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना,
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना.,

 

सिसकियाँ लेता है वजूद मेरा गालिब,
नोंच नोंच कर खा गई तेरी याद मुझे.,

 

ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री,
हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे.,

 

उग रहा है दर-ओ-दीवार से सबज़ा ग़ालिब,
हम बयाबां में हैं और घर में बहार आई है.,

 

ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना,
बन गया रक़ीब आख़िर था जो राज़-दाँ अपना.,

 

घर में था क्या कि तेरा ग़म उसे ग़ारत करता,
वो जो रखते थे हम इक हसरत-ए-तामीर सो है.,

 

तुम न आए तो क्या सहर न हुई,
हाँ मगर चैन से बसर न हुई,
मेरा नाला सुना ज़माने ने मगर,
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई.,

 

तेरी वफ़ा से क्या हो तलाफी की दहर में,
तेरे सिवा भी हम पे बहुत से सितम हुए.,

 

ghalib shayari

 

कहते तो हो यूँ कहते, यूँ कहते जो यार आता,
सब कहने की बात है कुछ भी नहीं कहा जाता,

आशिकी सब्र तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होने तक.,

 

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना,
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना.,

 

हमने माना कि तग़ाफुल न करोगे लेकिन,
खाक हो जायेंगे हम तुझको ख़बर होने तक.,

 

आईना क्यों न दूँ कि तमाशा कहें जिसे,
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे.,

 

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,
दिल के बहलाने को ग़ालिब ख़याल अच्छा है.,

 

आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक.,

 

चाँदनी रात के खामोश सितारों की कसम,
दिल में अब तेरे सिवा कोई भी आबाद नहीं.,

 

 

आता है दाग-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद,
मुझसे मेरे गुनाह का हिसाब ऐ खुदा न माँग.,

 

दिल गंवारा नहीं करता शिकस्ते-उम्मीद,
हर तगाफुल पे नवाजिश का गुमां होता है.,

 

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना,
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना.,

 

तुम न आओगे तो मरने की हैं सौ तदबीरें,
मौत कुछ तुम तो नहीं है कि बुला भी न सकूं.,

 

ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता.,

 

आशिक़ी सब्र तलब और तमन्ना बेताब,
दिल का क्या रंग करूँ खून-ए-जिगर होने तक.,

 

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया,

वर्ना हम भी आदमी थे काम के.,

 

काबा किस मुँह से जाओगे ग़ालिब,

शर्म तुम को मगर नहीं आती.,

 

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,

आख़िर इस दर्द की दवा क्या है.,

 

इस पोस्ट में आपको हमने स्पेशल Ghalib Shayari पढाई जो हम आशा करते की आपको बेहद पसंद आई होगी अगर हां तो आप अगली बार हमरी Hindi shayari की बाकि शयरी जरुर पढ़े.

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